राम प्रभु का राजतिलक
राम प्रभु का राजतिलक

|| ​श्री गुरुवे नमः ||

~*~ राम प्रभु का राजतिलक ~*~ 

Dedicated to my Guru

Shri Ravindra Jain ji

Written by -

~*~   ​अनिकेत कुमार ~*~

​This poem contains some lines having star ' * ' it indicates that these lines are based on the lines written and sung by Shri Ravindra Jain ji. 

Just like him, his lines based on the lines written by Maharishi Valmiki  and Goswami Tulsidas.

 Since I consider him above Maharishi Valmiki  and Goswami Tulsidas, my lines are based on his holy and divine lines and dedicated to him, because I have learnt all these things from him and he is my Eternal Guru.

॥ जय श्री राम ॥
॥ श्री गणेशाय नम ||
 
श्री राम कथा है, अति पाव‌नी, पावन है जिसका हर एक प्रसंग, प्रसंग - प्रसंग है जिसका न्यारा,
एक मैं भी कहने जा रहा , लेकर हे नाथ नाम तिहारा।
ज्ञान नहीं इतना,  शक्ति नहीं इतनी, 
फिर भी हे  राम प्रभु,  करना भक्ति प्रदान इतनी ।
कि कर सकू,  प्रभु आपके गुणों का गुणगान, 
 दूर करना अवगुण मेरें , समझ कर मुझे बालक नादन | 
*** श्री राम कथा , एक परम पावन कथा ```कथा यह पुण्य प्रसंगा है,
तन मन पावन करने वाली, कोटि कोटि शोक संताप व पाप हरने वाली गुण गंगा है,
कथा यह पुण्य प्रसंगा है |
श्री राम प्रभु का नाम लें, अब मैं राम राजतिलक की पावन कथा सुनाता हूँ, 
स्मरण कर राम प्रभु का दरबार, मन ही मन मैं हर्षाता हूँ,
 मैं अति पुण्य दायनी कथा आज सुनाता हूँ ।
जब होना था राम प्रभु का राजतिलक, सजाना था प्रभु राम का दरबार. 
तब गुरु वशिष्ठ जी बैठ भक्तों और मित्रों संग राम के`````राम के राजतिलक पर करें विचार ।
वशिष्ठ जी बोले, संयोग से कल का योग अच्छा है ,
कल ही हो श्री राम राज तिलक,  ऐसी ही सुरगण की भी इच्छा है ।
राम राजतिलक देखने को सभी है लालायित,  सभी का है मन ,
पर उचित रूप से राम तिलक हो सम्पन्न, है इसमें एक विघ्न, है इसमें एक अड़चन ।
समुद्र में होता समस्त नदियों का जल  समाहित, सो राजतिलक हेतु सागर का जल लाना है,
करके राजतिलक,  त्रिलोकी नाथ को अवधनाथ बनाना है।
परन्तु समुद्र है दूर - दूर समुद्र से भला जल कौन लाएगा, 
कार्य है यह अति दुष्कर - असहज - असहज को सहज भला कौन बनाएगा ।
निज आसन से तब डोलें,
हरने को पीर - हनुमत वीर, धर कर धीर,  धरा कर धीर, यह बोले।
श्री राम कृपा से सागर तट पर मैं जाऊँगा,
राम काज में न होये अकाज``` काज यह मैं राम का चाकर``` सागर जाकर कर के आऊँगा ,
सागर तट पर.मैं जाऊँगा ।
तापश्चात -
ले कर अपने प्रभु राम का नाम,
जपते- जपते रघुपति राघव राजा राम,
राम काम होए अविराम ,
सम्पन्न कर आए , पवनवेग से पवनसुत यह भी काम ।
अब गुरुजन ,परिजन, पुरजन संग हनुमत, सुग्रीव विभीषन, भुला कर  तन मन करे श्री राम राजतिलक की तैयारी,
हो करके आनंदित , हर्षित , मुदित नाच रहा तिहुं लोक , संग नाच रही अयोध्या सारी,
करें सभी राजतिलक की तैयारी,
अब जो पूरी हुई राम राजतिलक की तैयारी,
मुदित हो झूम उठी अयोध्या सारी॥
अगले दिन अत्यन्त मनोहारी मंगलकारी दिन है आया,
राम राजतिलक पर राम भक्तों ने सश्रद्धा, रामदरबार सजाया 
अत्यंत पुण्यकारी दिन है आया,
राम बनेंगे अब रघुराया, मंगलकारी दिन है आया।
अत्यंत मंगलकारी दिन है आया॥
घर-घर बाज रही बधाई, 
चहुँ दिश ऐसी खुशियाँ छाई,
कि खुशियों पर खुश हो, सारी खुशियों ने मानों नूतन खुशियाँ हैं पाई।
दसों दिशाओं में दे रहा मंगल गीत सुनाई, 
बाजे रे  बाजे ,घर-घर आज बधाई॥
करे तिहुं लोक यही गुणगान,
चल अवधपति बनने को हमारे भगवान, 
जय श्री राम कृपानिधान, जय श्री राम कृपानिधान॥
देख विराजित सिंहासन पर राजा राम संग माता सीते,
करें सभी प्रार्थना यह पल कल्प सम बीते।
जो देखे सियाराम का जोड़ा  सो मंत्रमुग्ध हो जाए ,
***  वैकुण्ठ के लक्ष्मी नारायण का जोड़ा - जोड़ा  धरती पर सियाराम कहाए।
सहस्त्रों मुखों की महिमा, तेज ,  सुन्दरता जिसकी  वरणी न जाए।
जो देखे सो परम शांति , परम पद को पाए,
सुंदरता ऐसी, ऐसी आभा , देख जिसे कोटि-कोटि रति काम लजाए,
बैकुंठ के लक्ष्मी नारायण का जोड़ा जोड़ा धरती पर सियाराम कहाए ।
 सश्रद्धा सभी शीश नवाए ,कर वंदन सभी हर्षाए,
 ***  बैकुंठ के लक्ष्मी नारायण का जोड़ा -  जोड़ा धरती पर सियाराम कहाए ,सियाराम कहाए ॥
लखि एक श्यामल और गौर शरीरा ,
महामतिशाली रणधीरा,  मतिधीरा भयउ अधीरा,
 लखि एक श्यामल और गौर शरीरा ।
भक्त शिरोमणी देवर्षि नारद चातुर ‍‍‍‍‍‍- हो करके आतुर,  नारायण-नारायण की रट को भूलें,
राम दरबार को निहार, राम प्रभु की कर जय-जयकार,भक्ति के पावन-पालने में  बालक भाँति झूलें।
नारायण-नारायण की रट को भूलें॥
राम दरबार की झाँकी मनोहारी-से होने सुखारी, अरुण भी अश्वो पर लगाम लगाए
राम के मुख पर विराजित तेज , सूर्य से भी न सहा न जाए,
नैन मूंद वह भी प्रभु राम के गुण गाए,
हे सियाराम ! हे सियाराम ! अब तुम ही होऊ मोहे सहाय,
तेज तुम्हारा सहा न जाए ॥
राम दरबार के दृश्य के दरस को ,शिव ने ध्यान समाधी से त्यागा,
शिव हैं राम के आराध्य देव परम - परम  भक्त राजा राम के - राम के अनुरागा।
जब भोले - भंडारी,  कैलाशपति , नील कंठ, नाथ त्रिपुरारी ने आँखें खोली।
तो दोऊ कर जोर उमा उनसे बोली॥
किस कारण नाथ भंग हुआ तप है तुम्हारा,
किस भक्त ने है तुमको पुकारा।
शिव बोले, मनोयोग से सुनो-सुनो, हे पार्वती हिमालय सुजाता।
ध्यान लगा  कर सुनो-सुनो है पार्वती हिमालय सुजाता
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता में मोड नया एक आता,
देख जिसे आज सम्पूर्ण जग है हर्षाता,
मनोयोग से सुनो-सुनो, हे पार्वती हिमालय सुजाता।
अयोध्या का दृश्य दिखा कर शिव बोले,  सुनो उमा,
सिंहासन पर विराजित हैं राजा राम - संग उनके राजित है सिय रूप में रमा।
सजा हुआ है आज मेरे प्रभु का पावन दरबार,
संग में तुम भी करो  सियाराम की जय जयकार,
होएगा हरष अपार, करो राम प्रभु की जय जयकार।
परम यह पावन प्रसंग - प्रसंग  पुनीता है।
नायक जिसके है रामचन्द्र, नायिका भगवति सीता है,
कथा राम को अत्यन्त पुनिता है,
प्रभु हैं राम चन्द्र संग राजित माता सीता है, 
कथा यह अत्यंत पुनीता है। 
करके  दरस जीवन सफल बनाओं,
मैं भी गुणगान करूँ, संग मेरे तुम भी करते जाओ,
फल मनोवांछित पाओ, राम, सियाराम  जयराम कहते जाओ॥
फिर प्रसन्न मन, ब्रह्मा जी ने यह प्रसंग जब ब्रह्माणी को सुनाया,
तो कहते-सुनते ब्रह्मा के हस्त में राजित वेदों के भी श्रवण में आया।
मानो जैसे, परम पुण्य के धाम वेदों का भी पुण्य आज फलित हो आया,
सुन कर जिसे चारों वेद हरषाया,
बड़े संयोग से सुअवसर है पाया,प्रत्येक वेद हरषाया॥
संग सभी के बनने को बड़भागी,
वेदों ने राम दरबार जाने की आज्ञा माँगी।
वेद बोले है - चहुँ-मुखि  सृष्टा,
हम भी होना चाहते हैं दृष्टा । 
सो हमें भी राम दरबार जाने दे।
हो रहा है गुणगान प्रभु का, गुणगान हमें भी गाने दे।
ब्रह्मा जी बोले, सुनो हे वेद,
हो प्रसन्न, त्यागो संशय ,शोक और खेद,
मत हो इतने आकुल-  बेकल, आतुर इतने - इतने अधीर,
राम दरबार जाओ तुम,  श्रीराम के गुण गाओ तुम```` तुम धर कर के मानव शरीर ॥
*** तत्पश्चात मानव रूप वेद धर आए,
दोऊ कर जोर  राम गुण गाए,
गुणशील - गुणनिधि, राम का गुणगान कर सभी हरषाए,  
हरष इतना ,  हरष  हृदय न समाए,
सब कुछ बिसरा राम गुण गाए।।
वेद संग नारद-शारद, ब्रह्मा उमा, शम्भु,  गुणगान गा रहे,
सुनकर जिसे,  समस्त गगनचर, जलचर, नदियाँ- निर्झर, क्या रात्रि-चर, क्या दिनचर सभी प्रसन्नता को पा रहे।।
इस प्रकार से वशिष्ठ जी ने राम जी का राज्याभिषेक किया,
अयोध्या की वह पावन नगरी चौदह बरस जिसे भारत ने सम्भारी- करी जिसकी रखवारी , वह राम को दिया।
अब पूर्ण हुआ राम राजतिलक, हुआ तिहुं लोक प्रसन्न,
 यह परम पुण्य प्रसंग, लौकिक रूप से हुआ सम्पन्न।
परन्तु रामकथा का अथवा उसके किसी  प्रसंग का कहां कहीं समापन,
आदि अंतहीन मध्य है न , न ओर न छोर जिसका,  कहां से भला होगा उसका मापन।
श्री रामकथा एक विशाल ,अथाह महासागर,
बुद्धि मेरी , हृदय मेरा एक छोटी सी गागर,
मेरा मन को मन्दिर बना, रहना तुम उसमें आकर,
धन्य हो जाऊंगा नाथ,  तुम्हारी भक्ति मैं पाकर,
बुद्धि मेरी,  हृदय मेरा एक छोटी सी गागर, 
रामकथा  विशाल ,अथाह महासागर।
लेकर के नाम राम का ,करता सब तुम्हें समर्पित,
गुरू मेरे श्री रविन्द्र जैन जी,कथा, कलम सब उन्हें अर्पित।
बात नहीं है,  मात्र यह कपोल कल्पित,
यह तो है भाव वो ,  भाव जो ,  हृदय मैं मेरे स्थित,
गुरू हैं मेरे श्री रविन्द्र जैन जी,
कथा, कलम सब उन्हें समर्पित, 
कथा, कलम सब उन्हें समर्पित । 
करके सियाराम को नमस्कार, कर ज़ोर कर , कर वन्दन बारम्बार,
अब कलम पर विराम लगाए अनिकेत कुमार,
हे राम प्रभु हे तारनहार, हे जगतप्रतिपाला,
हैं दीनदयाला विश्वाधार।
समस्त भूल भुला कर मेरी, मेरे भेंट को कर लेना स्वीकार,
हे जगत के नाव के खेवईया, हमारी भी नईया लगाना पार,
नईया जो फँसी मझधार।
तुम्हीं हो नाथ जीवन मेरे , मेरे जीवन का आधार,
अपने चरण सरोज रज का दास बना,  करना हमारा उद्धार,
हे कृपासिन्धु ! हे दीनबन्धु ! हम हैं तुच्छ भक्त एक - एक दास तिहार।
अपनी शरण में राखो हर बार, हम हैं दास तिहार,
भक्ति प्रदान कर , करना प्रभु हमारा उद्धार,
हम हैं दास तिहार, हम हैं दास तिहार,
॥ जय श्री राम ॥
इति

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